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Gorakh Dibbi/ Rudra Kund at Jwalaji
(Mata Jwala Ji Temple- District Kangra, Himachal Pradesh)

|| Jai Maa Jwala Ji||

Just above the main temple room of Mata Jwala Ji, is the Rudra Kund or famously refered as the Gorakh Dibbi. After coming out of the main temple room from the right side, take the parikrama and follow the stairwars upside at the back of the temple. A few steps up is room where you will find the Rudra Kund. At this kund, Maa Jwala is present in the form of Maa Anjana Jwala Ji Jyoti.

This is the place where Guru Gorakkh Nath Ji had worshipped Maa Bhagwati.

गोरख  डिब्बी" की कथा

ज्वाला जी  तीर्थ का सबसे  महत्वपूर्ण  पूजा का  स्थान गोरख  डिब्बी है। यहाँ पर डिब्बी  का अर्थ जल कुण्ड  से है । इस जल कुण्ड का नाम    गोरख  डिब्बी  होने के पीछे  भी नाथ संप्रदाय के प्रमुख योगी राज बाबा गोरखनाथ से सम्बन्ध है । इसी के नाम से ही इसका नाम  गोरख  डिब्बी पड़ा ।

आजकल डिब्बी का अर्थ "जलकुंड " से किया जाता है । परन्तु  गोरखनाथ जी ने जिस डिब्बी  को माता  को गर्म  करने को कहा था , वह मिट्टी का पात्र था ,  जिसमे में खिचड़ी पकाना चाहते थे । यहाँ पर डिब्बी का अर्थ मिट्टी का पात्र है , इसके बारे में एक कथा है -

सिद्ध कर्णरीया मेवाड़  के राजा थे । उनकी कई रानिया थी । उनकी एक रानी का नाम पिंगला था । राजा अपनी दूसरी रानियों की अपेक्षा अधिक प्यार करते थे । दूसरी तरफ रानी पिंगला भी राजा से इतना ही अधिक प्रेम करती थी । जब राजा , पिंगला के साथ रहते थे तब रानी की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता था । वह हमेशा राजा  से कहती रहती थी कि  वह उनके बिना जिन्दा नहीं रह सकती ।


एक दिन राजा ने अपनी रानी की परीक्षा लेने की सोची । राजा के मन में यह विचार आया की क्यों न रानी की परीक्षा ले जाये ।  

कि  रानी जो हर वक़्त यह कहती है की वह हमारे लिये जान दे सकती है , इसमें कुछ सचाई भी है या रानी बस हमारा दिल रखने के लिये ये सारी बाते कहती है।  यह सोचकर राजा ने एक योजना बनाई । और एक दिन वो शिकार खेलने के बहाने अकेले ही जंगल में चले गए । और कुछ दिनों के बाद राज्य में यह समाचार प्रसारित करवाया कि  राजा कर्णरिया , शिकार खेलते समय एक चीते के हमले से घायल होकर स्वर्गवासी हो गए । इस समाचार के सुनते ही जैसे पुरे राज्य में हाहाकार सा छा गया । राजा सिद्ध कर्णरीया अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखते थे । इसलिये ये बात सुनकर पूरी प्रजा में शोक का माहौल कायम हो गया ।और दूसरी तरफ राजा की मौत का  समाचार सुनते ही रानी पिंगला ने अपनी जान दे दी । उसने अपनी जान देकर यह साबित कर दिया की वह राजा से कितना प्यार करती थी । और राजा सिद्ध कर्णरीया के प्रति उसका प्यार सच्चा और पवित्र था । जब राजा को यह समाचार मिला तो उन्हें अपनी इस गलती पर बहुत अफ़सोस हुआ । परन्तु अब क्या हो सकता था , रानी ने अपना प्यार साबित कर दिया था । जब रानी का शव शमशान घाट लाया गया तो राजा भी वहा  पहुचा और और रानी के शव के पास खड़ा होकर " हाय !  पिंगला "  " हाय !  पिंगला " कहकर विलाप करने लगा । राजा की ये दशा देखकर अन्य परिजन भी शोकाकुल  हो गए और जोर -जोर से रोने लगे । इस समय पूरा माहौल जैसे गम में डूब गया हो ।

संयोग की बात थी कि उसी समय बाबा गोरखनाथ उस श्मशान वाले रास्ते से  जा रहे थे । राजा को विलाप करता देख वो रुक गए और राजा को समझाने की कोशिश की | और कहा

हे ! राजन ,

तुम अपनी मरी हुई रानी पिगला के लिये विलाप करना बंद कर दो , तुम्हारे इस तरह विलाप करने से रानी जिन्दी नहीं होगी । परन्तु इस बातो का राजा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा ।

इसके बाद बाबा गोरखनाथ ने अपने हाथ में पकड़े मिट्टी  के बर्तन को धरती पर गिरा  दिया । और पात्र के टूटने पर वह ' हा डीबी , हा डीबी  कहकर रोने लगे ।

राजा ने उनसे कहा कि  वह उन्हें दूसरा पात्र दे देगे , परन्तु गोरखनाथ जी इस पर भी नहीं माने । इस पर राजा ने उन्हें मुर्ख कहा । इस पर बाबा  गोरखनाथ जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर  भी मिट्टी  के बर्तन की तरह है , जो समय आने पर टूट जायेगा । अतः मृत पिगला को प्राप्त करने के लिये रोना धोना भी मुर्खता है |


गोरख डिब्बी के दर्शन --


इसके दर्शन के लिये बरामदे से कुछ सीढीया उतर कर ही आप जलकुण्ड  तक पहुच सकते है । यहाँ पर एक बहुत सुंदर द्श्य देखने को मिलता है । यहाँ पर एक शिलाखंड  है जिसके एक कोने में से ज्वाला निकलती रहती है । इस   शिलाखंड के नीचे जलकुण्ड है ,जिसके पास मशाल , धुप या जलती हुई माचिस रखने से ज्वाला प्रकट हो जाती है। और क्षण में ही विलुप्त हो जाती है , इस ज्वाला को भी माँ भगवती का ही रूप मानते है। यह एक चमत्कार ही है की कुण्ड का जल उबलता रहता है परन्तु गर्म नहीं होता । इस के  साथ ही विशाल भवन में गुरु गोरखनाथ की धुनी है जिसमे  बहुत सारे त्रिशूल है । इसके पास ही चौकी पर गुरु गोरखनाथ का चित्र है । इस चित्र के पास में ही संगमरमर की चौकी पर योगी सम्प्रदाय के प्रवर्तक योगिराज। ……………।  नाथ जी का बड़ा चित्र है । इस स्थान की स्थापना के समय से ही एक ज्वाला निकलती रहती है। इस स्थान पर इन सभी की साए काल  पूजा होती रहती है |


माँ ज्वालामुखी की शरण में बाबा गोरखनाथ जी -


एक बार बाबा गोरखनाथ जी घूमते हुए माता ज्वालामुखी के तीर्थ पर पहुच गए । उन दिनों में लोग माता  के नाम से बलि दिया करते थे । जब योगिराज माता के चरणों में उपस्थित हुए तो माता ने उन्हें दर्शन दिए । कुशल समाचार पूछने के बाद माँ ने गोरखनाथ को भोजन के लिये कहा । इसके जबाब में गोरखनाथ में बड़ी विनम्रता से कहा की हे माँ मै  तो आपके दर्शन के लिये आया था , आपके दर्शन हो गए माँ , मेरे लिये यही बहुत बड़ा सौभाग्य है । मेरी तो हर मनोकामना पूरी हो गयी ।

इस पर देवी ने कहा कि  दर्शन की भूख दर्शन से और भोजन की भूख को भोजन से ही मिटाना चाहिए । इसके आलावा भी अगर कोई बाधा है तो उसे भी दूर करने की कोशिश की जाएगी ।

यह सुनकर गोरखनाथ ने कहा -  " सभी रहस्य जानने पर भी यदि आप आग्रह करती है तो वास्तव में आपके निमत्रण को अस्वीकार करने का यह अर्थ है कि  योगी के लिये आतंरिक और बाहरी दोनों प्रकार की शुद्धी रखना जरुरी है । ऐसी दशा में यदि आपका भोजन ग्रहण करते है जो की मॉस से युक्त है । तो मै  अपनी दोनों प्रकार की शुद्धी  खो देता हु । मै  तो माता रानी आपसे भी ऐसा भोजन न ग्रहण करने की प्राथना करता हु ।

तब माता रानी में कहा की मैंने कंही भी और कभी भी ऐसा भोजन नहीं चाहती हु । लोगो ने अपने स्वाद के लिये ऐसी प्रथा चला रखी  है । आप अपनी इच्छा बताये की आप किस प्रकार का भोजन लेने की  इच्छा रखते है आपके लिये फिर उस प्रकार के भोजन की व्यवस्था की जाये ।

इस पर गोरखनाथ ने कहा की " मातेश्वरी ! आपका अतिथि सत्कार पूरा हुआ और हमने पुरे मन से आपका निमंत्रण स्वीकार करता हु । मेरी अभिलाषा है कि  मै  खिचड़ी खाऊ । इसमें जल आपका और अन्न हमारा होगा । आप डिब्बी में थोडा सा जल गर्म कर दे , तब तक मै  कुछ भिछा मागकर लाता  हु । "


माता ने कहा " जैसी आपकी इच्छ " पर जितना वक़्त आपको भिछा लाने में लगेगा उतने समय में तो ये पूरा पर्वत ही गरम किया जा सकता है । "


इस बात पर गोरखनाथ ने कहा की " जल गर्म होते ही वह आ जायेगे । "

ऐसा कहकर गोरखनाथ वहा से चले गए ।

फिर वो भिन्न -भिन्न स्थानों पर जाकर भ्रमण करने लगे ।

दूसरी ओर माँ ने डिब्बी में रखे जल को गर्म करने की बजाय  एक छोटे से जल कुण्ड को ही गर्म करने के लिये उसके आस-पास में कई ज्वालाए जला दी । कुछ ही देर में कुण्ड  का जल गर्म होकर उबलने लगा , परन्तु गर्म नहीं हुआ । और जब जल गर्म नहीं हुआ तो गोरखनाथ भी नहीं आये । क्योकि गोरखनाथ ने कहा था की जैसे ही जल गर्म होगा , वह आ जाएगे । आज भी यही स्थिति बनी हुई है । तभी से इस स्थान पर माँ ज्वालामुखी के साथ -साथ श्री गोरखनाथ जी की भी पूजा होती है । और इसके साथ ही साथ इनके गुरु  मत्स्येन्द्रनाथ  की भी पूजा होती है । प्राचीन ग्रंथो में इन दोनों महापुरुषों का नाम साथ -साथ स्मरण किया जाता है ।


 

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Blog:

Neelakshi singh Khangarot...- Jaipur (Raj.): Good Job Guyzz...
May Mahamaai bless u..
i want to know why devotte's cant cross Bias river with  Maa chintpurni's Halwa prasad..????
Plzz Reply me fast...
Jai mata di
Admin: thanks for the blessings from Maa. For the answer, I am afraid, I have not heard of the reason till now. There could be a story behind the same as well. Will try to get the reason in near future. If anyone else knows, kindly let us all know. Jai Maa!

banti singh begusarai bihar bharat: ye hamare dharam ki jawala hai jo sadiyo se aaj tak bujhi nahi. 'this is the great history of hindu &hindu dharam. our maaa realy protect all people like a child,,who belive&love maa

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